और इस मोडपे आकर
जिंदगी... कुछ ठहर सी जाती है जिंदगी...
रुकी रुकी सी सांसे
झुकी झुकी सी आंखे
और सहमे हुए दिलोंके धुंदलाते अरमानोंमें
जिंदगी... फिरसे जागना चाहती है जिंदगी...
तूटे हुए सपनोंके बिखरे पडे तुकडे
थरथरातें हाथोंसें समेटते हुए
जिंदगी... जख्मोंको भूलाना चाहती है जिंदगी...
नफरत की आगमें
जल जाते है नगमें
और बुझते हुए पलोंकी रुलाती है यादें
पर जिंदगी... फिर भी हसना चाहती है जिंदगी
Sunday, November 30, 2008
जिंदगी...
Posted by Janhavee Moole at 1:23 AM
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