Sunday, November 30, 2008

जिंदगी...

और इस मोडपे आकर
जिंदगी... कुछ ठहर सी जाती है जिंदगी...

रुकी रुकी सी सांसे
झुकी झुकी सी आंखे
और सहमे हुए दिलोंके धुंदलाते अरमानोंमें
जिंदगी... फिरसे जागना चाहती है जिंदगी...

तूटे हुए सपनोंके बिखरे पडे तुकडे
थरथरातें हाथोंसें समेटते हुए
जिंदगी... जख्मोंको भूलाना चाहती है जिंदगी...

नफरत की आगमें
जल जाते है नगमें
और बुझते हुए पलोंकी रुलाती है यादें
पर जिंदगी... फिर भी हसना चाहती है जिंदगी

Sunday, August 31, 2008

वो बस चलता रहा

अपनीही जिंदगीसे दूर

किसी मंझिल की तलाशमें



पर वो उससे रूठी

कुछ ऐसे, की वो बिखर गया...

अपनीही जिंदगीकी याद में