इतनी मौते देखली, के जिंदगीसे डर गए
अपनोंको उसने मारा,
और हम जिंदा रहकर मर गए...
मौतको तो हम समझ न पाए
हमसे क्या ऐसी खता हो गयी ?
अपनोंको जो बचा न पाए,
हमसे हैं जिंदगी खफा हो गयी...
कही फिर मौत को जिंदगीसे इकरार हो न जाए
और हमें फिर जिंदगीसे प्यार हो न जाए...
(Written on December 30th, 2004- After the Indian Ocean Tsunami)
Tuesday, October 10, 2006
Posted by Janhavee Moole at 1:22 PM 0 comments
Subscribe to:
Comments (Atom)
