Tuesday, October 10, 2006

इतनी मौते देखली, के जिंदगीसे डर गए
अपनोंको उसने मारा,
और हम जिंदा रहकर मर गए...

मौतको तो हम समझ न पाए
हमसे क्या ऐसी खता हो गयी ?
अपनोंको जो बचा न पाए,
हमसे हैं जिंदगी खफा हो गयी...

कही फिर मौत को जिंदगीसे इकरार हो न जाए

और हमें फिर जिंदगीसे प्यार हो न जाए...

(Written on December 30th, 2004- After the Indian Ocean Tsunami)

Thursday, September 7, 2006

अमन का सफर

बडी कठीन सफर है,
हर मुष्किल हम पार करेंगे हसते हसते,
दोस्ती का हाथ आगे बढाए,
वे फिर आ रहे है,
अमन के रास्ते, अमन के वास्ते

कैसा अमन? कौनसे वास्ते?

कल न भूला है कोई,
हम जानते है, और वे भी समझ गए है,
के जवानोंके जीवन नही हैं सस्ते...


अब भी क्या समझेंगे सभी?

ये सरहदोंकी लकीरे,
नही बांटती है मुल्कको, और नाही दिलोंको...
बट जाती है तो सियासते...
और बंद हो जाते है अमन के रास्ते...
मर जाते है अमन के फरिश्ते...

अब हम एक क्यों न बने,

जब हवाएँ एकसी है...?
बारिश, नदियाँ, सागर एक है...
मिट्टी भी एक है, और इतिहास तो एकही है...

क्यों सपने देखते है हम
के फिर आएगी बहार
और फिर खुशियोंसे खिल उठेगी वादी?
जब डर मनमें हीं है
के ये ख्वाहिशें पह ना जाए आधी....